ऋग्वेद 1.164.42
१तस्या॑: समु॒द्रा अधि॒ वि क्ष॑रन्ति॒ तेन॑ जीवन्ति प्र॒दिश॒श्चत॑स्रः ।तत॑: क्षरत्य॒क्षरं॒ तद् विश्व॒मुप॑ जीवति॥
1tasyā: samudrā adhi vi kṣaranti tena jīvanti pradiśaścatasraḥ |tata: kṣaratyakṣaraṃ tad viśvamupa jīvati ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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