ऋग्वेद 1.172.3तृ॒ण॒स्क॒न्दस्य॒ नु विश॒: परि॑ वृङ्क्त सुदानवः ।ऊ॒र्ध्वान् नः॑ कर्त जी॒वसे॑॥tṛṇaskandasya nu viśa: pari vṛṅkta sudānavaḥ |ūrdhvān naḥ karta jīvase ||इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें