ऋग्वेद 1.176.3
यस्य॒ विश्वा॑नि॒ हस्त॑यो॒: पञ्च॑ क्षिती॒नां वसु॑ ।स्पा॒शय॑स्व॒ यो अ॑स्म॒ध्रुग्दि॒व्येवा॒शनि॑र्जहि॥
yasya viśvāni hastayo: pañca kṣitīnāṃ vasu |spāśayasva yo asmadhrugdivyevāśanirjahi ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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