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ऋग्वेद 1.182.5
यु॒वमे॒तं च॑क्रथु॒: सिन्धु॑षु प्ल॒वमा॑त्म॒न्वन्तं॑ प॒क्षिणं॑ तौ॒ग्र्याय॒ कम् ।येन॑ देव॒त्रा मन॑सा निरू॒हथु॑: सुपप्त॒नी पे॑तथु॒: क्षोद॑सो म॒हः॥
yuvametaṃ cakrathu: sindhuṣu plavamātmanvantaṃ pakṣiṇaṃ taugryāya kam |yena devatrā manasā nirūhathu: supaptanī petathu: kṣodaso mahaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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