ऋग्वेद 1.51.10
तक्ष॒द् यत्त॑ उ॒शना॒ सह॑सा॒ सहो॒ वि रोद॑सी म॒ज्मना॑ बाधते॒ शव॑: ।आ त्वा॒ वात॑स्य नृमणो मनो॒युज॒ आ पूर्य॑माणमवहन्न॒भि श्रव॑:॥
takṣad yatta uśanā sahasā saho vi rodasī majmanā bādhate śava: |ā tvā vātasya nṛmaṇo manoyuja ā pūryamāṇamavahannabhi śrava: ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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