ऋग्वेद 1.51.14
इन्द्रो॑ अश्रायि सु॒ध्यो॑ निरे॒के प॒ज्रेषु॒ स्तोमो॒ दुर्यो॒ न यूप॑: ।अ॒श्व॒युर्ग॒व्यू र॑थ॒युर्व॑सू॒युरिन्द्र॒ इद्रा॒यः क्ष॑यति प्रय॒न्ता॥
indro aśrāyi sudhyo nireke pajreṣu stomo duryo na yūpa: |aśvayurgavyū rathayurvasūyurindra idrāyaḥ kṣayati prayantā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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