ऋग्वेद 1.52.15
आर्च॒न्नत्र॑ म॒रुत॒: सस्मि॑न्ना॒जौ विश्वे॑ दे॒वासो॑ अमद॒न्ननु॑ त्वा ।वृ॒त्रस्य॒ यद् भृ॑ष्टि॒मता॑ व॒धेन॒ नि त्वमि॑न्द्र॒ प्रत्या॒नं ज॒घन्थ॑॥
ārcannatra maruta: sasminnājau viśve devāso amadannanu tvā |vṛtrasya yad bhṛṣṭimatā vadhena ni tvamindra pratyānaṃ jaghantha ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें