ऋग्वेद 1.54.5
नि यद् वृ॒णक्षि॑ श्वस॒नस्य॑ मू॒र्धनि॒ शुष्ण॑स्य चिद् व्र॒न्दिनो॒ रोरु॑व॒द् वना॑ ।प्रा॒चीने॑न॒ मन॑सा ब॒र्हणा॑वता॒ यद॒द्या चि॑त्कृ॒णव॒: कस्त्वा॒ परि॑॥
ni yad vṛṇakṣi śvasanasya mūrdhani śuṣṇasya cid vrandino roruvad vanā |prācīnena manasā barhaṇāvatā yadadyā citkṛṇava: kastvā pari ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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