ऋग्वेद 1.54.6
त्वमा॑विथ॒ नर्यं॑ तु॒र्वशं॒ यदुं॒ त्वं तु॒र्वीतिं॑ व॒य्यं॑ शतक्रतो ।त्वं रथ॒मेत॑शं॒ कृत्व्ये॒ धने॒ त्वं पुरो॑ नव॒तिं द॑म्भयो॒ नव॑॥
tvamāvitha naryaṃ turvaśaṃ yaduṃ tvaṃ turvītiṃ vayyaṃ śatakrato |tvaṃ rathametaśaṃ kṛtvye dhane tvaṃ puro navatiṃ dambhayo nava ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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