ऋग्वेद 1.58.5
तपु॑र्जम्भो॒ वन॒ आ वात॑चोदितो यू॒थे न सा॒ह्वाँ अव॑ वाति॒ वंस॑गः ।अ॒भि॒व्रज॒न्नक्षि॑तं॒ पाज॑सा॒ रज॑: स्था॒तुश्च॒रथं॑ भयते पत॒त्रिण॑:॥
tapurjambho vana ā vātacodito yūthe na sāhvām̐ ava vāti vaṃsagaḥ |abhivrajannakṣitaṃ pājasā raja: sthātuścarathaṃ bhayate patatriṇa: ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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