ऋग्वेद 1.58.6
द॒धुष्ट्वा॒ भृग॑वो॒ मानु॑षे॒ष्वा र॒यिं न चारुं॑ सु॒हवं॒ जने॑भ्यः ।होता॑रमग्ने॒ अति॑थिं॒ वरे॑ण्यं मि॒त्रं न शेवं॑ दि॒व्याय॒ जन्म॑ने॥
dadhuṣṭvā bhṛgavo mānuṣeṣvā rayiṃ na cāruṃ suhavaṃ janebhyaḥ |hotāramagne atithiṃ vareṇyaṃ mitraṃ na śevaṃ divyāya janmane ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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