ऋग्वेद 1.62.7
द्वि॒ता वि व॑व्रे स॒नजा॒ सनी॑ळे अ॒यास्य॒: स्तव॑मानेभिर॒र्कैः ।भगो॒ न मेने॑ पर॒मे व्यो॑म॒न्नधा॑रय॒द् रोद॑सी सु॒दंसा॑:॥
dvitā vi vavre sanajā sanīḷe ayāsya: stavamānebhirarkaiḥ |bhago na mene parame vyomannadhārayad rodasī sudaṃsā: ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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