ऋग्वेद 1.74.1
गोतमो राहूगणः। अग्निः। गायत्री। · gotamo rāhūgaṇaḥ | agniḥ | gāyatrī |
उ॒प॒प्र॒यन्तो॑ अध्व॒रं मन्त्रं॑ वोचेमा॒ग्नये॑ ।आ॒रे अ॒स्मे च॑ शृण्व॒ते॥
upaprayanto adhvaraṃ mantraṃ vocemāgnaye |āre asme ca śṛṇvate ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें