ऋग्वेद 1.84.9
यश्चि॒द्धि त्वा॑ ब॒हुभ्य॒ आ सु॒तावाँ॑ आ॒विवा॑सति ।उ॒ग्रं तत् प॑त्यते॒ शव॒ इन्द्रो॑ अ॒ङ्ग॥
yaściddhi tvā bahubhya ā sutāvām̐ āvivāsati |ugraṃ tat patyate śava indro aṅga ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें