ऋग्वेद 10.102.12
त्वं विश्व॑स्य॒ जग॑त॒श्चक्षु॑रिन्द्रासि॒ चक्षु॑षः ।वृषा॒ यदा॒जिं वृष॑णा॒ सिषा॑ससि चो॒दय॒न्वध्रि॑णा यु॒जा॥
tvaṃ viśvasya jagataścakṣurindrāsi cakṣuṣaḥ |vṛṣā yadājiṃ vṛṣaṇā siṣāsasi codayanvadhriṇā yujā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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