ऋग्वेद 10.108.6
अ॒से॒न्या व॑: पणयो॒ वचां॑स्यनिष॒व्यास्त॒न्व॑: सन्तु पा॒पीः ।अधृ॑ष्टो व॒ एत॒वा अ॑स्तु॒ पन्था॒ बृह॒स्पति॑र्व उभ॒या न मृ॑ळात्॥
asenyā va: paṇayo vacāṃsyaniṣavyāstanva: santu pāpīḥ |adhṛṣṭo va etavā astu panthā bṛhaspatirva ubhayā na mṛḷāt ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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