ऋग्वेद 10.114.6
ष॒ट्त्रिं॒शाँश्च॑ च॒तुर॑: क॒ल्पय॑न्त॒श्छन्दां॑सि च॒ दध॑त आद्वाद॒शम् ।य॒ज्ञं वि॒माय॑ क॒वयो॑ मनी॒ष ऋ॑क्सा॒माभ्यां॒ प्र रथं॑ वर्तयन्ति॥
ṣaṭtriṃśām̐śca catura: kalpayantaśchandāṃsi ca dadhata ādvādaśam |yajñaṃ vimāya kavayo manīṣa ṛksāmābhyāṃ pra rathaṃ vartayanti ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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