ऋग्वेद 10.116.9
प्रेन्द्रा॒ग्निभ्यां॑ सुवच॒स्यामि॑यर्मि॒ सिन्धा॑विव॒ प्रेर॑यं॒ नाव॑म॒र्कैः ।अया॑ इव॒ परि॑ चरन्ति दे॒वा ये अ॒स्मभ्यं॑ धन॒दा उ॒द्भिद॑श्च॥
prendrāgnibhyāṃ suvacasyāmiyarmi sindhāviva prerayaṃ nāvamarkaiḥ |ayā iva pari caranti devā ye asmabhyaṃ dhanadā udbhidaśca ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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