ऋग्वेद 10.120.8
इ॒मा ब्रह्म॑ बृ॒हद्दि॑वो विव॒क्तीन्द्रा॑य शू॒षम॑ग्रि॒यः स्व॒र्षाः ।म॒हो गो॒त्रस्य॑ क्षयति स्व॒राजो॒ दुर॑श्च॒ विश्वा॑ अवृणो॒दप॒ स्वाः॥
imā brahma bṛhaddivo vivaktīndrāya śūṣamagriyaḥ svarṣāḥ |maho gotrasya kṣayati svarājo duraśca viśvā avṛṇodapa svāḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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