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ऋग्वेद 10.131.1
सुकीर्तिः काक्षीवत्। इन्द्रः,४-५ अश्विनौ। त्रिष्टुप् , ४ अनुष्टुप्। · sukīrtiḥ kākṣīvat | indraḥ,4-5 aśvinau | triṣṭup , 4 anuṣṭup |
अप॒ प्राच॑ इन्द्र॒ विश्वाँ॑ अ॒मित्रा॒नपापा॑चो अभिभूते नुदस्व ।अपोदी॑चो॒ अप॑ शूराध॒राच॑ उ॒रौ यथा॒ तव॒ शर्म॒न्मदे॑म॥
apa prāca indra viśvām̐ amitrānapāpāco abhibhūte nudasva |apodīco apa śūrādharāca urau yathā tava śarmanmadema ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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