ऋग्वेद 10.135.1
कुमारो यामायनः। यमः। अनुष्टुप्। · kumāro yāmāyanaḥ | yamaḥ | anuṣṭup |
यस्मि॑न्वृ॒क्षे सु॑पला॒शे दे॒वैः स॒म्पिब॑ते य॒मः ।अत्रा॑ नो वि॒श्पति॑: पि॒ता पु॑रा॒णाँ अनु॑ वेनति॥
yasminvṛkṣe supalāśe devaiḥ sampibate yamaḥ |atrā no viśpati: pitā purāṇām̐ anu venati ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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