ऋग्वेद 10.143.5
यु॒वं भु॒ज्युं स॑मु॒द्र आ रज॑सः पा॒र ई॑ङ्खि॒तम् ।या॒तमच्छा॑ पत॒त्रिभि॒र्नास॑त्या सा॒तये॑ कृतम्॥
yuvaṃ bhujyuṃ samudra ā rajasaḥ pāra īṅkhitam |yātamacchā patatribhirnāsatyā sātaye kṛtam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें