ऋग्वेद 10.15.12
त्वम॑ग्न ईळि॒तो जा॑तवे॒दोऽवा॑ड्ढ॒व्यानि॑ सुर॒भीणि॑ कृ॒त्वी ।प्रादा॑: पि॒तृभ्य॑: स्व॒धया॒ ते अ॑क्षन्न॒द्धि त्वं दे॑व॒ प्रय॑ता ह॒वींषि॑॥
tvamagna īḷito jātavedo'vāḍḍhavyāni surabhīṇi kṛtvī |prādā: pitṛbhya: svadhayā te akṣannaddhi tvaṃ deva prayatā havīṃṣi ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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