ऋग्वेद 10.16.11
यो अ॒ग्निः क्र॑व्य॒वाह॑नः पि॒तॄन्यक्ष॑दृता॒वृध॑: ।प्रेदु॑ ह॒व्यानि॑ वोचति दे॒वेभ्य॑श्च पि॒तृभ्य॒ आ॥
yo agniḥ kravyavāhanaḥ pitṝnyakṣadṛtāvṛdha: |predu havyāni vocati devebhyaśca pitṛbhya ā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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