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ऋग्वेद 10.165.2
शि॒वः क॒पोत॑ इषि॒तो नो॑ अस्त्वना॒गा दे॑वाः शकु॒नो गृ॒हेषु॑ ।अ॒ग्निर्हि विप्रो॑ जु॒षतां॑ ह॒विर्न॒: परि॑ हे॒तिः प॒क्षिणी॑ नो वृणक्तु॥
śivaḥ kapota iṣito no astvanāgā devāḥ śakuno gṛheṣu |agnirhi vipro juṣatāṃ havirna: pari hetiḥ pakṣiṇī no vṛṇaktu ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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