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ऋग्वेद 10.169.2
याः सरू॑पा॒ विरू॑पा॒ एक॑रूपा॒ यासा॑म॒ग्निरिष्ट्या॒ नामा॑नि॒ वेद॑ ।या अङ्गि॑रस॒स्तप॑से॒ह च॒क्रुस्ताभ्य॑: पर्जन्य॒ महि॒ शर्म॑ यच्छ॥
yāḥ sarūpā virūpā ekarūpā yāsāmagniriṣṭyā nāmāni veda |yā aṅgirasastapaseha cakrustābhya: parjanya mahi śarma yaccha ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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