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ऋग्वेद 10.180.1
जय ऐन्द्रः। इन्द्रः। त्रिष्टुप्। · jaya aindraḥ | indraḥ | triṣṭup |
प्र स॑साहिषे पुरुहूत॒ शत्रू॒ञ्ज्येष्ठ॑स्ते॒ शुष्म॑ इ॒ह रा॒तिर॑स्तु ।इन्द्रा भ॑र॒ दक्षि॑णेना॒ वसू॑नि॒ पति॒: सिन्धू॑नामसि रे॒वती॑नाम्॥
pra sasāhiṣe puruhūta śatrūñjyeṣṭhaste śuṣma iha rātirastu |indrā bhara dakṣiṇenā vasūni pati: sindhūnāmasi revatīnām ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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