ऋग्वेद 10.31.11
उ॒त कण्वं॑ नृ॒षद॑: पु॒त्रमा॑हुरु॒त श्या॒वो धन॒माद॑त्त वा॒जी ।प्र कृ॒ष्णाय॒ रुश॑दपिन्व॒तोध॑ॠ॒तमत्र॒ नकि॑रस्मा अपीपेत्॥
uta kaṇvaṃ nṛṣada: putramāhuruta śyāvo dhanamādatta vājī |pra kṛṣṇāya ruśadapinvatodhaṝtamatra nakirasmā apīpet ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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