ऋग्वेद 10.49.7
अ॒हं सूर्य॑स्य॒ परि॑ याम्या॒शुभि॒: प्रैत॒शेभि॒र्वह॑मान॒ ओज॑सा ।यन्मा॑ सा॒वो मनु॑ष॒ आह॑ नि॒र्णिज॒ ऋध॑क्कृषे॒ दासं॒ कृत्व्यं॒ हथै॑:॥
ahaṃ sūryasya pari yāmyāśubhi: praitaśebhirvahamāna ojasā |yanmā sāvo manuṣa āha nirṇija ṛdhakkṛṣe dāsaṃ kṛtvyaṃ hathai: ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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