ऋग्वेद 10.58.8
यत्ते॒ सूर्यं॒ यदु॒षसं॒ मनो॑ ज॒गाम॑ दूर॒कम् ।तत्त॒ आ व॑र्तयामसी॒ह क्षया॑य जी॒वसे॑॥
yatte sūryaṃ yaduṣasaṃ mano jagāma dūrakam |tatta ā vartayāmasīha kṣayāya jīvase ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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