Loading
ऋग्वेद 10.60.5
इन्द्र॑ क्ष॒त्रास॑मातिषु॒ रथ॑प्रोष्ठेषु धारय ।दि॒वी॑व॒ सूर्यं॑ दृ॒शे॥
indra kṣatrāsamātiṣu rathaproṣṭheṣu dhāraya |divīva sūryaṃ dṛśe ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलेंइन्द्र॑ क्ष॒त्रास॑मातिषु॒ रथ॑प्रोष्ठेषु धारय ।दि॒वी॑व॒ सूर्यं॑ दृ॒शे॥
indra kṣatrāsamātiṣu rathaproṣṭheṣu dhāraya |divīva sūryaṃ dṛśe ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें