ऋग्वेद 10.60.7
अ॒यं मा॒तायं पि॒ताऽयं जी॒वातु॒राग॑मत् ।इ॒दं तव॑ प्र॒सर्प॑णं॒ सुब॑न्ध॒वेहि॒ निरि॑हि॥
ayaṃ mātāyaṃ pitā'yaṃ jīvāturāgamat |idaṃ tava prasarpaṇaṃ subandhavehi nirihi ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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