ऋग्वेद 10.61.14
भर्गो॑ ह॒ नामो॒त यस्य॑ दे॒वाः स्व१र्ण ये त्रि॑षध॒स्थे नि॑षे॒दुः ।अ॒ग्निर्ह॒ नामो॒त जा॒तवे॑दाः श्रु॒धी नो॑ होतॠ॒तस्य॒ होता॒ध्रुक्॥
bhargo ha nāmota yasya devāḥ sva1rṇa ye triṣadhasthe niṣeduḥ |agnirha nāmota jātavedāḥ śrudhī no hotaṝtasya hotādhruk ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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