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ऋग्वेद 10.63.9
भरे॒ष्विन्द्रं॑ सु॒हवं॑ हवामहेंऽहो॒मुचं॑ सु॒कृतं॒ दैव्यं॒ जन॑म् ।अ॒ग्निं मि॒त्रं वरु॑णं सा॒तये॒ भगं॒ द्यावा॑पृथि॒वी म॒रुत॑: स्व॒स्तये॑॥
bhareṣvindraṃ suhavaṃ havāmaheṃ'homucaṃ sukṛtaṃ daivyaṃ janam |agniṃ mitraṃ varuṇaṃ sātaye bhagaṃ dyāvāpṛthivī maruta: svastaye ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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