ऋग्वेद 10.66.11
स॒मु॒द्रः सिन्धू॒ रजो॑ अ॒न्तरि॑क्षम॒ज एक॑पात्तनयि॒त्नुर॑र्ण॒वः ।अहि॑र्बु॒ध्न्य॑: शृणव॒द्वचां॑सि मे॒ विश्वे॑ दे॒वास॑ उ॒त सू॒रयो॒ मम॑॥
samudraḥ sindhū rajo antarikṣamaja ekapāttanayitnurarṇavaḥ |ahirbudhnya: śṛṇavadvacāṃsi me viśve devāsa uta sūrayo mama ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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