ऋग्वेद 10.72.9
स॒प्तभि॑: पु॒त्रैरदि॑ति॒रुप॒ प्रैत्पू॒र्व्यं यु॒गम् ।प्र॒जायै॑ मृ॒त्यवे॑ त्व॒त्पुन॑र्मार्ता॒ण्डमाभ॑रत्॥
saptabhi: putrairaditirupa praitpūrvyaṃ yugam |prajāyai mṛtyave tvatpunarmārtāṇḍamābharat ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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