ऋग्वेद 10.86.15
वृ॒ष॒भो न ति॒ग्मशृ॑ङ्गो॒ऽन्तर्यू॒थेषु॒ रोरु॑वत् ।म॒न्थस्त॑ इन्द्र॒ शं हृ॒दे यं ते॑ सु॒नोति॑ भाव॒युर्विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः॥
vṛṣabho na tigmaśṛṅgo'ntaryūtheṣu roruvat |manthasta indra śaṃ hṛde yaṃ te sunoti bhāvayurviśvasmādindra uttaraḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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