ऋग्वेद 2.5.7
स्वः स्वाय॒ धाय॑से कृणु॒तामृ॒त्विगृ॒त्विज॑म् ।स्तोमं॑ य॒ज्ञं चादरं॑ व॒नेमा॑ ररि॒मा व॒यम्॥
svaḥ svāya dhāyase kṛṇutāmṛtvigṛtvijam |stomaṃ yajñaṃ cādaraṃ vanemā rarimā vayam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें