ऋग्वेद 2.8.6
अ॒ग्नेरिन्द्र॑स्य॒ सोम॑स्य दे॒वाना॑मू॒तिभि॑र्व॒यम् ।अरि॑ष्यन्तः सचेमह्य॒भि ष्या॑म पृतन्य॒तः॥
agnerindrasya somasya devānāmūtibhirvayam |ariṣyantaḥ sacemahyabhi ṣyāma pṛtanyataḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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