ऋग्वेद 4.4.4
उद॑ग्ने तिष्ठ॒ प्रत्या त॑नुष्व॒ न्य१मित्राँ॑ ओषतात् तिग्महेते ।यो नो॒ अरा॑तिं समिधान च॒क्रे नी॒चा तं ध॑क्ष्यत॒सं न शुष्क॑म्॥
udagne tiṣṭha pratyā tanuṣva nya1mitrām̐ oṣatāt tigmahete |yo no arātiṃ samidhāna cakre nīcā taṃ dhakṣyatasaṃ na śuṣkam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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