ऋग्वेद 5.12.3
कया॑ नो अग्न ऋ॒तय॑न्नृ॒तेन॒ भुवो॒ नवे॑दा उ॒चथ॑स्य॒ नव्य॑: ।वेदा॑ मे दे॒व ऋ॑तु॒पा ऋ॑तू॒नां नाहं पतिं॑ सनि॒तुर॒स्य रा॒यः॥
kayā no agna ṛtayannṛtena bhuvo navedā ucathasya navya: |vedā me deva ṛtupā ṛtūnāṃ nāhaṃ patiṃ saniturasya rāyaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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