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ऋग्वेद 5.42.6
म॒रुत्व॑तो॒ अप्र॑तीतस्य जि॒ष्णोरजू॑र्यत॒: प्र ब्र॑वामा कृ॒तानि॑ ।न ते॒ पूर्वे॑ मघव॒न् नाप॑रासो॒ न वी॒र्यं१ नूत॑न॒: कश्च॒नाप॑॥
marutvato apratītasya jiṣṇorajūryata: pra bravāmā kṛtāni |na te pūrve maghavan nāparāso na vīryaṃ1 nūtana: kaścanāpa ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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