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ऋग्वेद 5.42.9
वि॒स॒र्माणं॑ कृणुहि वि॒त्तमे॑षां॒ ये भु॒ञ्जते॒ अपृ॑णन्तो न उ॒क्थैः ।अप॑व्रतान् प्रस॒वे वा॑वृधा॒नान् ब्र॑ह्म॒द्विष॒: सूर्या॑द् यावयस्व॥
visarmāṇaṃ kṛṇuhi vittameṣāṃ ye bhuñjate apṛṇanto na ukthaiḥ |apavratān prasave vāvṛdhānān brahmadviṣa: sūryād yāvayasva ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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