ऋग्वेद 5.79.9
व्यु॑च्छा दुहितर्दिवो॒ मा चि॒रं त॑नुथा॒ अप॑: ।नेत् त्वा॑ स्ते॒नं यथा॑ रि॒पुं तपा॑ति॒ सूरो॑ अ॒र्चिषा॒ सुजा॑ते॒ अश्व॑सूनृते॥
vyucchā duhitardivo mā ciraṃ tanuthā apa: |net tvā stenaṃ yathā ripuṃ tapāti sūro arciṣā sujāte aśvasūnṛte ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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