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ऋग्वेद 6.23.6
ब्रह्मा॑णि॒ हि च॑कृ॒षे वर्ध॑नानि॒ ताव॑त् त इन्द्र म॒तिभि॑र्विविष्मः ।सु॒ते सोमे॑ सुतपा॒: शंत॑मानि॒ रान्द्या॑ क्रियास्म॒ वक्ष॑णानि य॒ज्ञैः॥
brahmāṇi hi cakṛṣe vardhanāni tāvat ta indra matibhirviviṣmaḥ |sute some sutapā: śaṃtamāni rāndyā kriyāsma vakṣaṇāni yajñaiḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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