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ऋग्वेद 6.23.9
तं व॑: सखाय॒: सं यथा॑ सु॒तेषु॒ सोमे॑भिरीं पृणता भो॒जमिन्द्र॑म् ।कु॒वित् तस्मा॒ अस॑ति नो॒ भरा॑य॒ न सुष्वि॒मिन्द्रोऽव॑से मृधाति॥
taṃ va: sakhāya: saṃ yathā suteṣu somebhirīṃ pṛṇatā bhojamindram |kuvit tasmā asati no bharāya na suṣvimindro'vase mṛdhāti ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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