ऋग्वेद 6.51.14
ग्रावा॑णः सोम नो॒ हि कं॑ सखित्व॒नाय॑ वाव॒शुः ।ज॒ही न्य१त्रिणं॑ प॒णिं वृको॒ हि षः॥
grāvāṇaḥ soma no hi kaṃ sakhitvanāya vāvaśuḥ |jahī nya1triṇaṃ paṇiṃ vṛko hi ṣaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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