ऋग्वेद 6.52.15
ये के च॒ ज्मा म॒हिनो॒ अहि॑माया दि॒वो ज॑ज्ञि॒रे अ॒पां स॒धस्थे॑ ।ते अ॒स्मभ्य॑मि॒षये॒ विश्व॒मायु॒: क्षप॑ उ॒स्रा व॑रिवस्यन्तु दे॒वाः॥
ye ke ca jmā mahino ahimāyā divo jajñire apāṃ sadhasthe |te asmabhyamiṣaye viśvamāyu: kṣapa usrā varivasyantu devāḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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