Loading
ऋग्वेद 7.18.19
आव॒दिन्द्रं॑ य॒मुना॒ तृत्स॑वश्च॒ प्रात्र॑ भे॒दं स॒र्वता॑ता मुषायत् ।अ॒जास॑श्च॒ शिग्र॑वो॒ यक्ष॑वश्च ब॒लिं शी॒र्षाणि॑ जभ्रु॒रश्व्या॑नि॥
āvadindraṃ yamunā tṛtsavaśca prātra bhedaṃ sarvatātā muṣāyat |ajāsaśca śigravo yakṣavaśca baliṃ śīrṣāṇi jabhruraśvyāni ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें