ऋग्वेद 8.100.10
यद्वाग्वद॑न्त्यविचेत॒नानि॒ राष्ट्री॑ दे॒वानां॑ निष॒साद॑ म॒न्द्रा ।चत॑स्र॒ ऊर्जं॑ दुदुहे॒ पयां॑सि॒ क्व॑ स्विदस्याः पर॒मं ज॑गाम॥
yadvāgvadantyavicetanāni rāṣṭrī devānāṃ niṣasāda mandrā |catasra ūrjaṃ duduhe payāṃsi kva svidasyāḥ paramaṃ jagāma ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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